पुस्तक के बारे में
खुद से इस्तीफ़ा
महमूद शाबान फ़सफ़ूस
खुद से इस्तीफ़ा
आपने कितनी बार फिर से शुरुआत की है?
पाँचवाँ अलार्म
इच्छाशक्ति इस कहानी की नायिका नहीं है
“बस इस एक बार…”
वह नोटबुक जिसे हम खोलते ही नहीं
मेरा दोस्त “कल”
आपके दिमाग़ में रहने वाला वकील
सलाद के बाद मिठाई
विरासत में मिला, मैंने चुना नहीं
वह आवाज़ जो हर रात आपको डाँटती है
वह बात जिसे वापस नहीं लिया जा सकता
वे मेहमान जिन्हें हमने बुलाया ही नहीं
“अगर”… वह शब्द जो आपकी नींद चुराता है
खिड़की और मंच के बीच
राजा लुई से बेहतर हाल में
वह छूट जो आपने खुद को दी
जब वह आसमान के नाम पर बोलता है
रोशनी के तीस दिन… फिर क्या?
आधे मौजूद
उठिए… चाहे सौवीं बार ही क्यों न हो
वह अलार्म जो पाँच बार बजता है
परिशिष्ट