खुद से इस्तीफ़ा
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तीसरा भाग

जो हम किसी से नहीं कहते

एक आवाज़ जो हर रात आपको दोष देती है। गुस्सा जिसे आप दबाते हैं, फिर उसी में फट पड़ते हैं। एक गुज़रता विचार जो आपको डराता है। और “अगर”, जो नींद चुरा लेता है। हम इन्हें ऐसे छिपाते हैं मानो इनका संबंध सिर्फ़ हमसे हो। इस भाग में हम इन्हें मेज़ पर रखेंगे: समझेंगे कि क्या हो रहा है और जो कर सकते हैं, उसे उस चीज़ से अलग करेंगे जो हमारे हाथ में नहीं है।

नौवाँ अध्याय

वह आवाज़ जो हर रात आपको डाँटती है

खुद पर सख़्ती हमें बेहतर क्यों नहीं बनाती?

पढ़ने में लगभग 6 मिनट

लोडिंग की पट्टी

करीम ने फ़ोन में गेम फिर डाउनलोड किया। फिर लोडिंग की पट्टी का इंतज़ार करने लगा, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति की ख़बर का इंतज़ार कर रहा हो जिससे वह मिलना नहीं चाहता। एक हफ़्ते पहले उसने गेम हटा दिया था। जिस रात उसने “पापा के लिए, या मेरे लिए” वाला काग़ज़ लिखा था, उसने फ़ोन तकिए से दूर रख दिया था।

अब एक बज चुका था। टीम के एक सदस्य ने लिखा: “तुम्हारी जगह अभी खाली है।” करीम ने रूममेट के बिस्तर की ओर देखा। रज़ाई हिल नहीं रही थी। चेहरा दीवार की ओर था। उसने प्रवेश का बटन दबा दिया।

बाज़ी खत्म हुई। वह बिस्तर के किनारे बैठा और फ़ोन अपने घुटनों के बीच रख दिया। पैरों के नीचे फ़र्श पर खाने का रैपर पड़ा था, जिसे सोने से पहले उठाने का उसने वादा किया था। आवाज़ ने कहा: “तुम किसी काम के नहीं हो।” छोटा-सा वाक्य था। उसमें वही ठहराव था जिसे वह अपने पिता की बातों से पहचानता था।

काग़ज़ लेने के लिए उसने दराज़ खोली। नीचे वह लिफ़ाफ़ा अब भी था जो पिता ने रवाना होते समय दिया था। उसे डर लगा कि उसमें भी वही बात होगी जो यह आवाज़ कहती है।

दूसरे बिस्तर पर रज़ाई हिली। रूममेट ने पूछा: “सोए नहीं?” करीम ने कहा: “अभी सोता हूँ।” वह हिला नहीं। स्क्रीन पर इंतज़ार का काउंटर बढ़ा। फिर नई बाज़ी का निमंत्रण आ गया।

करीम ने गेम फिर हटा दिया। उसका आइकन गायब हुआ तो राहत मिली। उसने काग़ज़ खींचा और लिखा: “मैं…” आगे उसे बस वही शब्द मिले जो याद हो चुके थे।

उसने कोशिश की कि उसी गलती को करने वाले किसी दोस्त के लिए जवाब लिखे। एक नरम वाक्य निकला। उसने उसे काट दिया। लगा जैसे वह खुद को कल के लिए इजाज़त दे रहा हो। वह दोष तय करने से सफ़ाई देने पर गया, फिर दोष तय करने पर लौट आया। बत्ती बंद करने के लिए उठा। काग़ज़ पर अभी भी न कोई समय था, न कोई काम, न अगला कदम।

शायद आप इस मुक़दमे को जानते हैं। गलती होती है, फिर आप गिनाने लगते हैं कि आप किसी काम के नहीं, इसके कितने सबूत हैं। लेकिन फ़ैसले के बाद क्या होता है? अगर वह आपको उसी काम पर लौटा देता है, तो क्या आपको और सख़्त जज चाहिए? या ऐसा वाक्य, जो सुधारने के लिए कोई काम आपके हाथ में छोड़े?

दो वाक्य, जिनके बीच पूरे एक साल की दूरी है

“मैंने गलती की” और “मैं बुरा हूँ” दो छोटे वाक्य हैं। एक जैसे लगते हैं। उनके बीच का अंतर सब कुछ बदल देता है।

“मैंने गलती की” किसी काम का वर्णन करता है। वह एक खास पल में हुआ। उसका ऐसा असर है जिसे आप सुधारने की कोशिश कर सकते हैं, जिसके लिए माफ़ी माँग सकते हैं, या जिससे सीख सकते हैं।

“मैं बुरा हूँ” आपके पूरे अस्तित्व पर फ़ैसला देता है। इसका कोई अंत नहीं, कोई सुधार संभव नहीं। क्योंकि यह किसी काम की नहीं, आपकी बात करता है।

मनोवैज्ञानिक दो भावनाओं में फ़र्क करते हैं। उनके नाम मिलते-जुलते हैं, लेकिन उनके असर में बहुत बड़ा अंतर है। अपराधबोध किसी खास काम से होने वाली परेशानी है। शर्म अपने पूरे अस्तित्व से होने वाली परेशानी है।

शोधकर्ता जून टैंगनी और रॉन्डा डियरिंग ने इस अंतर पर कई दशकों के अध्ययन एकत्र किए1. उन्हें एक लगभग स्थिर रुझान मिला। जो व्यक्ति शर्म से अधिक अपराधबोध महसूस करता है, वह अक्सर माफ़ी माँगने, सुधार करने और वह काम दोबारा न करने की कोशिश की ओर जाता है।

जो शर्म में डूब जाता है, वह अधिकतर इनकार करने, दूसरे पर दोष डालने, या अपनी गलती याद दिलाने वाले पर गुस्सा करने की ओर जाता है। कभी-कभी वह वही काम फिर कर लेता है, सिर्फ़ शर्म की भावना से भागने के लिए।

कठोर दोषारोपण आपको फिर उसी जगह क्यों लौटा देता है?

मनोवैज्ञानिक पॉल गिल्बर्ट “करुणा केंद्रित चिकित्सा” के संस्थापक हैं। अपनी किताब The Compassionate Mind में वे एक ऐसा सवाल पूछते हैं जो पहली बार अजीब लगता है2: आपका शरीर भीतर के कठोर शब्द को बाहर के वास्तविक खतरे की तरह क्यों लेता है? जवाब यह है कि खुद की कठोर आलोचना शरीर में वास्तविक खतरे से मिलती-जुलती प्रतिक्रिया सक्रिय कर देती है।

गिल्बर्ट इस रक्षात्मक व्यवस्था को “खतरे की प्रणाली” कहते हैं। आपका शरीर भावना से भागना चाहता है, किए गए काम का सामना नहीं करना चाहता। भागने का सबसे निकट का रास्ता वही आदत है जिसके बारे में आपको पता है कि वह शरीर को कुछ पल के लिए ही सही, सुन्न कर देती है।

इसके बरक्स गिल्बर्ट एक दूसरी व्यवस्था बताते हैं। इसे वे “शांत करने की प्रणाली” कहते हैं। इसमें शरीर इतना शांत होता है कि गलती को देख सके। उससे भागता नहीं, खुद से भी नहीं।

तो खतरे की इस प्रणाली का विकल्प क्या है? शोधकर्ता क्रिस्टिन नेफ़ ने अपने प्रति करुणा पर शोध की शुरुआत की। अपनी किताब Self-Compassion में वे इस नरमी को एक सरल उदाहरण से समझाती हैं3: गलती के बाद खुद से वैसा ही व्यवहार करें जैसा गलती करने वाले दोस्त से करते हैं। अपने प्रति करुणा का अर्थ किए गए काम को सही ठहराना नहीं। न ही उस पर पछताना छोड़ देना। इसका अर्थ शांत होकर उसे स्वीकारना है, बिना उसे अपनी पूरी कीमत पर फ़ैसला बनने दिए।

शोधकर्ता जूलियाना ब्राइन्स और सेरीना चेन ने इस विचार को अलग-अलग प्रयोगों में परखा। एक में उन्होंने प्रतिभागियों से वह प्रसंग याद करने को कहा जिसमें उन्होंने किसी के साथ गलत किया था। दूसरे में उन्हें एक कठिन परीक्षा दी, जिसमें वे अच्छा नहीं कर पाए।

नरमी की भाषा में लिखने से गलती सुधारने की इच्छा बढ़ी। अपने प्रति करुणा को प्रोत्साहित करने से प्रतिभागियों ने अगली परीक्षा की पढ़ाई में अधिक समय लगाया। प्रयोग के अनुसार उनकी तुलना उन समूहों से थी जिनमें आत्मसम्मान बढ़ाया गया, या ध्यान सकारात्मक चीज़ों पर लगाया गया, या कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया4.

यह नतीजा प्रयोगशाला के एक पल तक सीमित नहीं है। शोधकर्ता माइकल वोल और उनके दो सहयोगियों ने एक ही विषय की लगातार दो परीक्षाओं से पहले विश्वविद्यालय के छात्रों पर नज़र रखकर उनका अध्ययन किया5. पहली परीक्षा की पढ़ाई टालने के लिए खुद को माफ़ करने का संबंध अगली परीक्षा से पहले छात्रों द्वारा बताई गई कम टालमटोल से था। यहाँ माफ़ी के साथ और देरी नहीं जुड़ी, बल्कि पढ़ाई की ओर जल्दी लौटना जुड़ा।

﴿قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَى أَنْفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِنْ رَحْمَةِ اللَّهِ﴾ (ऐ नबी!) आप मेरे उन बंदों से कह दें, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किए हैं कि तुम अल्लाह की दया से निराश न हो। (अज़-ज़ुमर: 53)6

देखिए, किससे बात की जा रही है। “नेक लोगों” से नहीं, बल्कि “जिन्होंने अपने ऊपर ज़्यादती की” से। यानी जिन्होंने एक बार नहीं, बहुत गलतियाँ कीं। फिर भी संबोधन “ऐ मेरे बंदो” से शुरू होता है, किसी और कठोर शब्द से नहीं।

दोस्त की आवाज़

कब इस्तेमाल करें: ऐसी गलती के बाद जिसे आप अपने पूरे अस्तित्व पर फ़ैसला बना देते हैं। समय: लिखने के लिए पाँच मिनट, फिर अगले एक घंटे में एक कदम।

जब भीतर की आवाज़ आप पर मुक़दमा चलाए, तो यह अभ्यास आज़माएँ:

  1. आवाज़ को नाम दें। “मैं किसी काम का नहीं हूँ” जैसा वाक्य सुनें, तो एक पल रुकें। खुद से कहें: “यह फ़ैसला सुनाने की आवाज़ है, सच्चाई की नहीं।”
  2. पूछें: मैं किसी दोस्त से क्या कहूँगा? कल्पना करें कि आपका कोई प्यारा दोस्त आकर बताता है कि उसने ठीक यही काम किया। वह वाक्य लिखें जो आप उसे जवाब में कहते। शायद वह “तुम किसी काम के नहीं हो” नहीं होगा।
  3. काम का वर्णन करें, पहचान का नहीं। जो हुआ, उसे तथ्यों वाले वाक्य में लिखें, फ़ैसले में नहीं: “मैंने इतने बजे यह किया।” “मैं नाकाम हूँ” नहीं।
  4. याद रखें कि आप अकेले नहीं हैं। बहुत-से दूसरे लोग भी इसी तरह पुरानी आदत में लौटे हैं, भले उन्होंने आपको बताया न हो। यह किए गए काम को सही नहीं ठहराता, लेकिन यह भ्रम हटा देता है कि सिर्फ़ आप ही ऐसे हैं।
  5. अभी एक छोटा कदम चुनें। परिपूर्ण होने का वादा नहीं। अगले एक घंटे में एक ठोस काम: सोना, थोड़ा चलना, या किसी दोस्त को संदेश भेजना।

अगर गिर जाएँ: नए काम का वर्णन एक पंक्ति में करें। फिर अगला कदम चुनें। अपने बारे में वही फ़ैसला दोबारा मत लिखें।

दो हफ़्ते बाद एक मुश्किल रात करीम फिर गेम पर लौट आया। पुराना वाक्य सुनाई दिया। वह उसका जवाब लिखने लगा। आधा पन्ना भरने के बाद ध्यान आया: उसने एक और मुक़दमा शुरू कर दिया था, बस आवाज़ थोड़ी शांत थी।

उसने “अगर गिर जाएँ” वाली पंक्ति पढ़ी। लिखी बातों के नीचे लकीर खींची और लिखा: “मैंने एक बजकर दस मिनट पर गेम खोला, और चालीस मिनट खेला।” जो हुआ उसे नाम दिया, फिर घड़ी देखी। उसका अगला कदम पानी पीना और सोना था।

रसोई में उसका रूममेट पानी उबलने का इंतज़ार कर रहा था। उसने पूछा: “और खेलोगे?” करीम ने कहा: “नहीं। चालीस मिनट गँवाए हैं, पूरी रात नहीं।” उसने गिलास भरा। पिछले सालों की सूचियों की बात नहीं की। रूममेट ने कहा: “लौटते समय गलियारे की बत्ती बुझा देना।”

उसने गलियारे की बत्ती बुझाई और मेज़ के पास से गुज़रा। लिफ़ाफ़ा दराज़ में ही रहा। उसे खोलना इस रात का कदम नहीं था। उसने रज़ाई कंधों तक खींची और सो गया।

सोने से पहले

नोटबुक में, या किसी ऐसे माध्यम में जो ध्यान न भटकाए, लिखें और ईमानदारी से जवाब दें:

  1. गलती के बाद आपकी कठोर आवाज़ आम तौर पर कौन-सा वाक्य कहती है? ठीक वैसा ही लिखें जैसा सुनते हैं।
  2. अगर कोई दोस्त आपके सामने अपने बारे में यही कहता, तो आप उसे क्या जवाब देते?
  3. अंतिम फ़ैसला सुनाने के बजाय आज रात कौन-सा छोटा कदम उठा सकते हैं?

घर जाने वाली रात करीम ने बत्ती बुझाने से पहले तीन बार दराज़ की ओर देखा। बैग दरवाज़े तक ले गया। फिर फ़ोन का चार्जर लेने लौटा और लिफ़ाफ़ा वहीं छोड़ दिया।

संदर्भ (6)
  1. 1Tangney, J. P., & Dearing, R. L. (2002). Shame and Guilt. Guilford Press.
  2. 2Gilbert, P. (2009). The Compassionate Mind: A New Approach to Life's Challenges. Constable.
  3. 3Neff, K. (2011). Self-Compassion: The Proven Power of Being Kind to Yourself. William Morrow.
  4. 4Breines, J. G., & Chen, S. (2012). Self-compassion increases self-improvement motivation. Personality and Social Psychology Bulletin, 38(9), 1133–1143.
  5. 5Wohl, M. J. A., Pychyl, T. A., & Bennett, S. H. (2010). I forgive myself, now I can study: How self-forgiveness for procrastinating can reduce future procrastination. Personality and Individual Differences, 48(7), 803–808.
  6. 6पवित्र क़ुरआन, अज़-ज़ुमर: 53. आयत का पाठ.