चौथा अध्याय
वह नोटबुक जिसे हम खोलते ही नहीं
हम खुद को छोड़कर हर चीज़ का हिसाब क्यों रखते हैं?
लीना उठ रही थी कि उसके पिता ने कहा: “थोड़ी देर बैठो। पिछली बार कब मेरे पास पूरा एक घंटा बैठी थी?” दवा का डिब्बा मेज़ पर था। जिस हाथ में बैग नहीं था, उसमें फ़ोन था। उसने कहा: “पिछले हफ़्ते, पापा।” फिर पिछला हफ़्ता याद आया: आठ मिनट, दवा और फ़ोन। उसने बैग फिर कंधे पर रखा। मेज़ के किनारे से मिर्च का डिब्बा हटाया। उसके लेबल पर पिता की सुंदर, तिरछी लिखावट में एक शब्द था। मसालों के बाक़ी डिब्बों पर भी वही लिखावट थी।
उसके पिता लगभग साठ साल के थे। उनका घर दस मिनट की दूरी पर था। लीना हर दो या तीन दिन में उनके पास जाती। दवा रखती, फ़्रिज खोलती, रक्तचाप पूछती। फिर हाथ सूखने से पहले किसी संदेश का जवाब देने लगती। एक बार पिता ने किसी मेहमान से कहा था: “एक अच्छी कंपनी में अकाउंटेंट।” लीना रसोई से सुन रही थी। उसने शेल्फ़ पर टेढ़े रखे डिब्बे को सीधा कर दिया।
कार में उसकी घड़ी कंपन करने लगी: नौ हज़ार चार सौ बारह कदम। नींद का स्कोर सौ में इकहत्तर। कार की स्क्रीन पर था: इस महीने ईंधन का खर्च आठ प्रतिशत बढ़ा। उसने नोट्स खोले। “पापा” लिखा। फिर रुक गई। समझ नहीं आया, इसके आगे कौन-सा आँकड़ा लिखे।
जिसे मापते नहीं, वह हाथ से फिसलता जाता है
और आप? इस महीने अपने सबसे क़रीबी लोगों के साथ आपने कितने घंटे सुकून से बिताए?
हम वह गिनते हैं जिसे दर्ज करना आसान हो। जिसे देखने के लिए हमने समय ही नहीं रखा, उसे भूल जाते हैं। फ़ोन आपके कदम गिन देता है। किसी प्रियजन के साथ बिताया घंटा आपके सिवा कोई नहीं गिनता।
अपने हफ़्ते का वर्णन करने के बजाय उसका हिसाब खोलिए। आपने कहा था कि हर शाम पढ़ते हैं। कितनी शामों को सचमुच किताब खोली? कहा था कि ख़रीदारी कम की है। ऐसी चीज़ों पर कितना खर्च किया जो सूची में नहीं थीं? भाई से मदद का वादा किया था। उसे कितनी बार “थोड़ी देर बाद” कहा, जब तक वह सो नहीं गया? “कोशिश कर रहा हूँ” मत लिखिए। जो हुआ, वह लिखिए। पढ़ाई के सात तय समय। उनमें से दो पर आप आए। मदद के तीन वादे। एक आपने निभाया। इन संख्याओं का असर “व्यस्त” शब्द नहीं पैदा कर सकता। शायद यही वजह है कि आप नोटबुक खोलना टाल रहे हैं।
जब नतीजा धुँधला रहता है, तो आप अपने बारे में दो उलटी तस्वीरें रख सकते हैं। एक ऐसा इंसान जो गंभीर लक्ष्य तय करता है। दूसरा ऐसा इंसान जिसे उनके लिए कभी समय नहीं मिलता। पन्ना दोनों तस्वीरें साथ लाता है। आप देखते हैं कि समय किसी और चीज़ में चला गया। कुछ बातें जिन्हें आप हालात कहते हैं, उसी दिन और उसी घंटे बार-बार हुईं। पन्ना दूसरों को दिखाना ज़रूरी नहीं। आप खुद उसे बिना सजाए पढ़िए। अगर आपको पता ही नहीं कि वादा कहाँ टूटा, तो अगले हफ़्ते का वादा कैसे अलग होगा? आज जिस आँकड़े से आप बच रहे हैं, वह कल किए जा सकने वाले पहले बदलाव का पता दे सकता है।
उस इंसान को लीजिए जो कहता है: मैं कभी-कभी व्यायाम करता हूँ। बात सच है। लेकिन संख्याओं में इसका कोई मतलब नहीं निकलता। कभी-कभी का मतलब हफ़्ते में दो बार भी हो सकता है और महीने में दो बार भी।
जिसे मापा नहीं जाता, वह अचानक ग़ायब नहीं होता। धीरे-धीरे, दिन-ब-दिन फिसलता जाता है। हमें मोड़ का पता ही नहीं चलता। कल और आज का फ़र्क इतना छोटा होता है कि दिखता नहीं। जब आख़िरकार हम मुड़कर देखते हैं, तब तक दूरी बढ़ चुकी होती है।
असली ईंधन
शोधकर्ता टेरेसा अमाबिले और स्टीवन क्रेमर ने रोज़ लिखी गई डायरी की लगभग 12,000 प्रविष्टियों का अध्ययन किया। इन्हें 7 कंपनियों की 26 कार्य-टीमों के 238 लोगों ने लिखा था। वे यह जानना चाहते थे: एक दिन दूसरे दिन से बेहतर क्यों होता है?
अपनी किताब The Progress Principle (2011) में उन्होंने पाया कि सबसे प्रभावशाली बात है किसी ऐसी चीज़ में स्पष्ट प्रगति का अहसास जो आपके लिए अहम हो। चाहे वह प्रगति छोटी ही क्यों न हो1। अच्छे दिनों के लिए हमेशा बड़ी उपलब्धि ज़रूरी नहीं थी। अर्थपूर्ण काम में छोटी प्रगति भी बेहतर मनोदशा से जुड़ी थी।
आपकी घड़ी बनाने वाले ने आपके कदम दिखाने का डैशबोर्ड बना दिया। लेकिन माँ या पिता के साथ रिश्ते में आपकी प्रगति दिखाने का डैशबोर्ड किसने बनाया? या उस वादे के लिए जिसे आप बरसों से टाल रहे हैं?
किसी ने नहीं।
नोटबुक असर बढ़ाती है
शोधकर्ता बेंजामिन हार्किन और उनके सहकर्मियों के नेतृत्व में एक व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा ने लक्ष्यों की निगरानी पर 138 अध्ययन एकत्र किए। उनमें लगभग 20,000 लोगों ने हिस्सा लिया था2.
निष्कर्ष सरल है: जो अपने लक्ष्य की ओर प्रगति पर नज़र रखता है, वह औसतन उसे उस व्यक्ति से अधिक हासिल करता है जो नज़र नहीं रखता। असर का आकार क्षेत्र और निगरानी के तरीके के अनुसार बदलता है। केवल निगरानी लक्ष्य की गारंटी नहीं देती। लेकिन वह पलड़ा आपके पक्ष में झुका देती है।
प्रगति को केवल याद रखने के बजाय लिखने पर असर बड़ा था। किसी दूसरे व्यक्ति को उसकी जानकारी होने पर भी असर बड़ा था। ये अध्ययनों के समूहों के बीच के फ़र्क हैं। यह वादा नहीं कि आपका आँकड़ा दोगुना हो जाएगा। लेकिन सभी एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं: लिखिए और किसी को बताइए।
लिखा हुआ आँकड़ा आपका सामना करता है। आपको उसे सजाने नहीं देता। जिस आँकड़े को कोई और जानता है, उसमें वह बात जुड़ती है जो अकेली नोटबुक नहीं दे सकती: कोई पूछेगा।
हफ़्ते का लेखा
इसका मतलब ज़िंदगी को एक रूखी तालिका में बदल देना नहीं है। केवल दो या तीन आँकड़े। हर चीज़ नहीं। हर दिन का पूरा विवरण नहीं। मक़सद ढर्रा देखना है, समीकरण में जीना नहीं। यहाँ नोटबुक छोटी-सी सेविका है, मालकिन नहीं।
तो उन बातों के लिए एक छोटी नोटबुक शुरू कीजिए जिन्हें आपके लिए कोई नहीं गिनता।
हफ़्ते के अंत में लीना ने लिखा: पापा से मिलने तीन बार गई। उसने पति को पन्ना दिखाया। उन्होंने पूछा: “और कितनी देर बैठीं?” याद करने के लिए उसने कॉल का रिकॉर्ड खोला। फिर उस दिन की तस्वीरें। फिर संदेश। किसी से मदद नहीं मिली। तीन मुलाक़ातें गिनी जा सकती थीं। लेकिन दवा सँभालने के बाद बचा समय उसने लिखा नहीं था। मुलाक़ातों के नीचे लिखा: “पिछले हफ़्ते से ज़्यादा।” उन्होंने पंक्ति देखी। फिर उसकी ओर देखा। उसने “ज़्यादा” मिटा दिया। उसकी जगह ख़ाली छोड़ दी। अगली रात लौटते ही उसने मुलाक़ात के मिनट लिखे। काम के संदेश खोलने से पहले। बड़े पन्ने पर संख्या छोटी दिख रही थी। उसने उसे और महीन लिखावट में नहीं लिखा, जैसे खर्च की तालिका में जगह कम होने पर करती थी।
कब इस्तेमाल करें: जब ऐप के आँकड़े तो जानते हों, लेकिन यह न जानते हों कि अपने किसी अहम वादे को आपने क्या दिया। समय: हर रात एक मिनट। हफ़्ते के अंत में पन्ना देखने के लिए पाँच मिनट।
- दो या तीन आँकड़े चुनिए जो सचमुच आपके लिए अहम हों: किसी प्रियजन के साथ सुकून के घंटे, माँ को किए कॉल या वे रातें जब सोने से एक घंटे पहले फ़ोन बंद कर दिया।
- उन्हें एक साधारण पन्ने पर रखिए: दिन और आँकड़ा। कोई जटिलता नहीं। कोई अतिरिक्त ऐप नहीं।
- हर रात एक पंक्ति में आँकड़ा लिखिए: याद के आधार पर अनुमान लगाने के लिए हफ़्ते के अंत तक मत रुकिए। याद चीज़ों को सुंदर बना सकती है या ग़लती कर सकती है।
- हर हफ़्ते के अंत में एक व्यक्ति को पन्ना दिखाइए: जिसकी जानकारी दूसरों को हो, ऐसी निगरानी अक्सर छिपी निगरानी से ज़्यादा प्रभावशाली होती है।
अगर गिर जाएँ: आँकड़ा जैसा रहा, वैसा लिखिए। चाहे शून्य ही हो। फिर अगले हफ़्ते के लिए एक समय तय कीजिए।
दो हफ़्ते लेखा रखने के बाद लीना ने पति को पन्ना दिखाया। दो हफ़्तों में पिता के साथ तीन घंटे। उनमें से ज़्यादातर दूसरे हफ़्ते में थे। उसने पूछा: “काफ़ी हैं?” उन्होंने कहा: “चुनना तुम्हें है।” उसने संख्या के नीचे रेखा खींची। लिखा: शनिवार, फ़ोन के बिना एक घंटा।
तीसरे हफ़्ते उसने फ़ोन कार में रखा और पिता के घर गई। दस मिनट बाद फ़्रिज देखने के लिए उठी। उन्होंने कहा: “दवा अपनी जगह पर है।” वह बैठ गई। पहली बार की तरह मेज़ के किनारे से मिर्च का डिब्बा हटाया। फिर उस जेब में हाथ डाला जहाँ फ़ोन नहीं था। पिता हँसे: “कुछ खो गया?” उसने कहा: “यह घंटा आपके लिए है।”
उसने उनकी पहली नौकरी के बारे में पूछा। उन्होंने चाय का कप तश्तरी पर सरकाया। कहा: “एक आदमी के यहाँ। अपनी ज़िंदगी में उसके हाथ से ज़्यादा स्थिर हाथ नहीं देखा…” लीना ने सिर उठाया। लेकिन उन्होंने घड़ी की ओर देखा। उसने पूछा: “फिर?” उन्होंने कहा: “लंबी कहानी है। अगले शनिवार।” उसने एक पल इंतज़ार किया। फिर कुर्सी की पीठ से टिक गई।
एक घंटे बाद जब वह उठी, तो उन्होंने कहा: “आज तुम बैठीं।” कार में उसने साठ मिनट लिखे। यह नहीं लिखा कि उसने कुछ ठीक किया। शाम को पति से कहा: “मुझे सिर्फ़ बैठने को भी गिनना है।” फिर फ़ोन का कैलेंडर खोला। पिता की बाक़ी कहानी के लिए अगले शनिवार का एक घंटा तय कर दिया।
वह आँकड़ा जो आप नहीं जानते
केवल दो सवाल। पहला आज रात: ज़िंदगी का कौन-सा अहम पहलू है जिस पर अभी आप नज़र नहीं रख रहे? सोने से पहले उसका पहला आँकड़ा लिखिए।
दूसरा उसे दर्ज करने के एक हफ़्ते बाद: आपको क्या पता चला? कौन-सा बदलाव आज़माएँगे?
संदर्भ (2)
- 1Amabile, T., & Kramer, S. (2011). The Progress Principle: Using Small Wins to Ignite Joy, Engagement, and Creativity at Work. Harvard Business Review Press.
- 2Harkin, B., Webb, T. L., Chang, B. P. I., Prestwich, A., Conner, M., Kellar, I., Benn, Y., & Sheeran, P. (2016). Does monitoring goal progress promote goal attainment? A meta-analysis of the experimental evidence. Psychological Bulletin, 142(2), 198–229.