परिशिष्ट
जब वही स्थिति लौटे
यह किताब सिर्फ़ एक बार पढ़ने के लिए नहीं है। आप किसी ख़ास पल में इसकी तरफ़ लौटेंगे: टूटे हुए वादे के बाद, उस बात के बाद जो लगभग कह दी थी, या किसी लंबी रात के बाद जिसमें नींद नहीं आई।
ये पन्ने उसी पल के लिए हैं। अपनी जैसी स्थिति ढूँढ़िए। उसका अभ्यास और शुरुआत का एक क़दम लीजिए। अगर विस्तार से समझना चाहें, तो बताए गए अध्याय पर लौटिए।
पहला भाग: पानी पर लिखे वादे
- जब लोगों से किए वादे निभाते हैं, पर खुद से किए वादे तोड़ देते हैं। अभ्यास: “खुद से एक समझौता” — पहला अध्याय। कदम: एक वादे का दिन, वक़्त और जगह लिखिए। तय समय किसी दोस्त को भेजिए जो आपसे उसके बारे में पूछे।
- जब उत्साह से शुरुआत करते हैं, फिर कुछ दिनों बाद संकल्प बुझ जाता है। अभ्यास: “एक स्थिर लंगर” — दूसरा अध्याय। कदम: बहुत छोटी आदत अपने दिन के किसी बार-बार आने वाले पल से जोड़िए: “सुबह की कॉफ़ी के बाद मैं दो पन्ने पढ़ता हूँ।”
- जब खुद को कहते सुनते हैं, “बस इस एक बार।” अभ्यास: “चॉक की लकीर” — तीसरा अध्याय। कदम: एक नियम लिखिए जो “मैं नहीं करता” से शुरू हो। उसमें “अक्सर” या “आम तौर पर” न हो।
- जब नहीं जानते कि दिन कहाँ जाते हैं। अभ्यास: “हफ़्ते का लेखा” — चौथा अध्याय। कदम: आज रात एक संख्या लिखिए: आज अपने प्रिय लोगों के साथ कितने मिनट बिताए?
दूसरा भाग: जब हम नरमी से खुद को धोखा देते हैं
- जब उस काम को टालते हैं जिसे ज़रूरी जानते हैं। आलस के कारण नहीं, बल्कि एक अप्रिय भावना से बचने के लिए1। अभ्यास: “कल से सच्ची दोस्ती” — पाँचवाँ अध्याय। कदम: काम को इतना छोटा कीजिए कि दो मिनट में हो सके। अभी शुरू कीजिए।
- जब हर कमी के लिए बहाना तैयार रहता है। अभ्यास: “वकील से जिरह” — छठा अध्याय। कदम: आख़िरी बार जो बहाना कहा था, उसे लीजिए। पूछिए: अगर कोई दोस्त मुझसे यह कहता, तो क्या मैं मान लेता?
- जब खुद से कहते हैं, “वहाँ अच्छा काम किया, तो यहाँ कमी रह जाए तो कोई बात नहीं।” अभ्यास: “काम और घर के लिए एक ही तराज़ू” — सातवाँ अध्याय। कदम: इस हफ़्ते काम पर अपनी अच्छाई और घर पर अपनी कमी एक ही सूची में लिखिए। फिर जिससे किया वादा टाला था, उसके साथ एक हफ़्ते के भीतर का समय तय कीजिए।
- जब नहीं जानते कि विश्वास को ही ठुकरा रहे हैं या उस तरीक़े को जिससे वह आप पर थोपा गया था। अभ्यास: “दूसरा हस्ताक्षर” — आठवाँ अध्याय। कदम: एक विश्वास चुनिए। पूछिए: अगर आज मुझे शून्य से चुनने का अवसर मिले, तो क्या इसे चुनूँगा?
तीसरा भाग: जो हम किसी से नहीं कहते
- जब भीतर की आवाज़ हर रात आपको डाँटती है। अभ्यास: “दोस्त की आवाज़” — नौवाँ अध्याय। कदम: खुद पर दिए गए अपने आख़िरी फ़ैसले को ऐसे दोबारा कहिए जैसे किसी प्रिय दोस्त से कहते।
- जब चोट पहुँचाने वाली बात ज़बान पर हो, या जब सबके लिए मुस्कुराते हों और सबसे क़रीबी लोगों पर फट पड़ते हों। अभ्यास: “थोड़ा विराम, और सही दरवाज़ा” — दसवाँ अध्याय। कदम: बैठ जाइए। कोई भी बात कहने या संदेश भेजने से पहले खुद को दस मिनट दीजिए।
- जब मन में कोई ऐसा विचार आए जो आपको खुद से डरा दे। अभ्यास: “आता-जाता मेहमान” — ग्यारहवाँ अध्याय। कदम: उसे “आता-जाता मेहमान” नाम दीजिए और अपना काम जारी रखिए। अगर वह विचार आपको ख़ासी परेशानी देने लगे, जीवन में बाधा बने, या बहुत समय ले, तो किसी विशेषज्ञ से आकलन करवाइए।
- जब “अगर” आपकी नींद चुरा ले। अभ्यास: “आपके हाथ की सीमा” — बारहवाँ अध्याय। कदम: अपने डर को जो आपके हाथ में है और जो आपके हाथ में नहीं है, उनमें बाँटिए। सोने से पहले कहिए, “जो मेरे हाथ में था, उसकी तैयारी कर ली है। बाकी मेरे हाथ में नहीं है।”
चौथा भाग: वे चेहरे जो हम पहनते हैं
- जब स्क्रीन से बाहर आते हुए खुद को पहले से ज़्यादा अभाव में पाते हैं। अभ्यास: “सीखने की खिड़की, जीने की ज़िंदगी” — तेरहवाँ अध्याय। कदम: पहली तस्वीर जो आपको कमतर महसूस कराए, उसके सामने पूछिए: क्या मैं सच में यह चाहता हूँ, या सिर्फ़ उसके मालिक से कम न दिखना चाहता हूँ?
- जब हर पोस्ट के बाद लाइक्स का इंतज़ार करते हैं। अभ्यास: “सीखने की खिड़की, जीने की ज़िंदगी” — तेरहवाँ अध्याय। कदम: एक ऐप में लाइक्स की सूचनाएँ बंद कीजिए।
- जब किसी का आपको सुधारना बुरा लगता है। अभ्यास: “और महीन मुखौटा” — तेरहवाँ अध्याय। कदम: अगर वह सही है, तो कहिए, “हाँ, इस बात पर तुम सही हो।” ऐसी दलील मत जोड़िए जो इसे बेअसर कर दे।
- जब चाही हुई चीज़ सामान्य लगने लगे। अभ्यास: “जो शायद कभी न हुआ होता, उसे देखना” — चौदहवाँ अध्याय। कदम: कल्पना कीजिए कि वह शायद कभी मिली ही न होती। फिर उसमें एक ऐसी बारीकी का नाम लीजिए जिसकी आप क़द्र करते हैं।
- जब दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाले काम को अच्छी नीयत से उचित ठहराते हैं। अभ्यास: “उलटा सवाल” — पंद्रहवाँ अध्याय। कदम: पूछिए: अगर कोई दूसरा सांसारिक कारण से ऐसा करे, तो क्या मैं स्वीकार करूँगा? अगर नहीं, तो अभी अपना काम सुधारिए।
- जब धर्म के नाम पर बोलने वाले से सवाल पूछने में डरते हैं। अभ्यास: “संदेश और संदेशवाहक को अलग रखें” — सोलहवाँ अध्याय। कदम: सुनी हुई किसी राय पर एक सवाल लिखिए। एक हफ़्ते के भीतर उसे भेजने का समय तय कीजिए।
पाँचवाँ भाग: फिर से
- जब रमज़ान ख़त्म हो और आपकी बनाई हुई चीज़ साथ ले जाए। अभ्यास: “आपके समय के पड़ाव” — सत्रहवाँ अध्याय। कदम: अपने कैलेंडर में कोई पास का पड़ाव चुनिए। उसके आसपास निश्चित समय, तैयार कोना, या पूछने वाला साथी तय कीजिए।
- जब आप जगह पर हों, पर मन स्क्रीन में हो। अभ्यास: “दूसरा कमरा” — अठारहवाँ अध्याय। कदम: रोज़ आधे घंटे फ़ोन दूसरे कमरे में रखिए। ज़रूरत हो तो एक नंबर के लिए घंटी चालू रखिए।
- जब महीनों निभाने के बाद ठोकर खाते हैं। अभ्यास: “चूक के बाद तीन वाक्य” — उन्नीसवाँ अध्याय। कदम: जो हुआ उसे उसके असली आकार में बताइए, अपनी भावना के आकार में नहीं। फिर आज सबसे छोटे क़दम से लौटिए।
दो हफ़्तों की आपकी योजना
एक वादा चुनिए। हर दिन किताब के एक अभ्यास से उसकी तैयारी की समीक्षा कीजिए। सूची में नया वादा मत जोड़िए। यह समीक्षा का प्रयोग है, वह अवधि नहीं जिसके बाद हम आदत पूरी बन जाने का वादा करें। हमारा उदाहरण लीना का वादा है: हर शाम बीस मिनट डिज़ाइन का काम। उसका चुना हुआ गवाह पूछता है कि उसने क्या किया। उसकी जगह अपना वादा रखिए। पूरी यात्रा में उसका तय समय बनाए रखिए।
- पहला दिन: वादा और उसे पूरा करने का वक़्त लिखिए। किसी गवाह को चुनकर उसे तय समय भेजिए। “खुद से एक समझौता”, अध्याय 1।
- दूसरा दिन: जगह और ज़रूरत की चीज़ें तैयार कीजिए। शुरुआत को दिन में लौटने वाले संकेत से जोड़िए। “एक स्थिर लंगर”, अध्याय 2।
- तीसरा दिन: बार-बार दी जाने वाली छूट को नाम दीजिए। उसके लिए “मैं नहीं करता” से शुरू होने वाला स्पष्ट नियम लिखिए। “चॉक की लकीर”, अध्याय 3।
- चौथा दिन: जो सच में किया, उसे मिनटों या पन्नों में लिखिए। संख्या की जगह अपना इरादा मत रखिए। “हफ़्ते का लेखा”, अध्याय 4।
- पाँचवाँ दिन: पहले क़दम को दो मिनट का कीजिए। तय समय पर शुरू कीजिए। “कल से सच्ची दोस्ती”, अध्याय 5।
- छठा दिन: आख़िरी बहाना लिखिए। पूछिए: अगर कोई दोस्त मुझसे यह कहता, तो क्या मैं मान लेता? “वकील से जिरह”, अध्याय 6।
- सातवाँ दिन: आज का वादा निभाइए। कल की सफलता को आज से छूट मत बनाइए। “काम और घर के लिए एक ही तराज़ू”, अध्याय 7।
- आठवाँ दिन: लिखिए कि आपने खुद यह वादा क्यों चुना, और इसमें से क्या बनाए रखना चाहते हैं। “दूसरा हस्ताक्षर”, अध्याय 8।
- नौवाँ दिन: दोष देने वाला एक वाक्य दोबारा ऐसे कहिए जैसे दोस्त से कहते। फिर उपलब्ध क़दम को नाम दीजिए। “दोस्त की आवाज़”, अध्याय 9।
- दसवाँ दिन: जो आपके हाथ में है, उसे जो आपके हाथ में नहीं है उससे अलग कीजिए। पहले स्तंभ का एक क़दम पूरा कीजिए। “आपके हाथ की सीमा”, अध्याय 12।
- ग्यारहवाँ दिन: तुलना का वह स्रोत एक दिन के लिए दूर कीजिए जो आपकी मर्ज़ी के बिना आपका लक्ष्य बदल देता है। “सीखने की खिड़की, जीने की ज़िंदगी”, अध्याय 13।
- बारहवाँ दिन: ऐसी चीज़ की अनुपस्थिति की कल्पना कीजिए जो आपके वादे को संभव बनाती है। फिर कोई विशेष बारीकी बताइए जिसके आप आदी हो गए हैं। “जो शायद कभी न हुआ होता, उसे देखना”, अध्याय 14।
- तेरहवाँ दिन: वादे के समय फ़ोन दूर कीजिए। किसी तत्काल ज़रूरत का ध्यान रखिए। “दूसरा कमरा”, अध्याय 18।
- चौदहवाँ दिन: जो हुआ, उसे बताइए। एक शर्त बदलिए और अगला समय तय कीजिए। “चूक के बाद तीन वाक्य”, अध्याय 19।
लीना के काग़ज़ में पंक्ति की शुरुआत तय समय, जगह और गवाह के नाम से होती है। फिर वह उस डिज़ाइन फ़ाइल का नाम जोड़ती है जिसे खोलेगी, जितना समय सच में काम किया, और जो बहाना कहा। अगर एक दिन छूट जाए, तो चौदहों दिन शुरुआत से दोहराने की ज़रूरत नहीं। वह उस शर्त पर लौटती है जो ग़ायब थी और डिज़ाइन के अगले तय समय पर। वादा अब भी वही है। लेकिन काग़ज़ अब बताने लगा है कि वह कहाँ टूटता है।
समापन में “कल, पहला लंगर” पर आपने शुरुआत का समय लिखा था। उस समय को इस योजना में ला सकते हैं। अगर पता चले कि वादे का आकार आपके दिन में नहीं बैठता, तो दूसरा वादा लिखने से पहले उसके आकार की समीक्षा कीजिए।
जब कोई आदत छोड़ना चाहें
मिठाई या शक्कर वाली चीज़ों से अपना संबंध बदलना हो, या धूम्रपान छोड़ना हो, तो इन्हीं अभ्यासों पर लौट सकते हैं। उस नियम से शुरू कीजिए जो आपने खुद चुना है और जिसकी सीमाएँ समझते हैं। यह काम तैयार करने और उसकी समीक्षा करने का रास्ता है, आहार या इलाज का नुस्ख़ा नहीं।
- “मैं नहीं करता” सटीक लिखिए: खुले हुए शब्द “कम करूँगा” की जगह उस छूट का नाम लिखिए जिसे रोकना चाहते हैं। मिठाई का नियम हो सकता है, “मैं सूर्यास्त के बाद मिठाई नहीं खाता।” धूम्रपान का, “मैं धूम्रपान नहीं करता, देर रात की महफ़िलों में भी नहीं।” “चॉक की लकीर”, अध्याय 3 पर लौटिए।
- जगह और संकेत बदलिए: उस जगह को नाम दीजिए जहाँ आपका वह काम शुरू होता है। जो करेंगे, उसकी तैयारी कीजिए, बजाय बिना फ़ैसले के पुराने चक्र में घुसने के। “एक स्थिर लंगर”, अध्याय 2 पर लौटिए।
- किसी गवाह को बताइए: उसे नियम और पूछने का समय दीजिए। कहिए कि जो हुआ, उसके बारे में पूछे, आप पर फ़ैसला न दे। “खुद से एक समझौता”, अध्याय 1 पर लौटिए।
- लौटने वाला वाक्य तैयार कीजिए: “इस जगह चूक हुई। मैं यह शर्त बदलता हूँ और अगले तय समय पर लौटता हूँ।” “चूक के बाद तीन वाक्य”, अध्याय 19 पर लौटिए।
दोस्त के साथ पढ़िए
“पाँचवाँ अलार्म”, अध्याय 1 में हमने देखा था कि किसी की नज़र में रहने वाला वादा अधिक समय तक टिकता है। पढ़ने के साथ भी यही है।
किसी दोस्त, भाई, या अधिकतम पाँच लोगों के छोटे समूह को चुनिए। हर हफ़्ते सिर्फ़ एक अध्याय पढ़िए, उससे ज़्यादा नहीं। एक जैसा होना ज़रूरी नहीं है। यह किताब अपने वादों और आदतों को समझना चाहने वाले हर व्यक्ति के लिए है, चाहे शुरुआत की हो, ठोकर खाई हो, या अब भी सवाल पूछ रहा हो। आपके अनुभव अलग हों, फिर भी इसे साथ पढ़ सकते हैं।
हफ़्ते के आख़िर में आधे घंटे बैठिए या कॉल कीजिए। हर व्यक्ति के लिए तीन सवाल हैं:
- अध्याय का कौन-सा वाक्य पढ़कर लगा कि यह आपके बारे में लिखा गया है?
- इस हफ़्ते कौन-सा क़दम आज़माया, और सच में क्या हुआ?
- अगले हफ़्ते क्या आज़माएँगे, और ठीक कब?
फिर हर व्यक्ति अपना वादा लिखे। अगले मिलने पर बाकी लोग उससे उसके बारे में पूछें।
किसी से वह बात बताने की माँग न की जाए जिसे वह बताना नहीं चाहता। बातचीत में जो कहा जाए, वहीं रहे। आपमें से हर व्यक्ति दूसरे का गवाह है, उसका जज नहीं।