खुद से इस्तीफ़ा
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समापन

वह अलार्म जो पाँच बार बजता है

पढ़ने में लगभग 7 मिनट

वे पंद्रह मिनट याद हैं?

वह समय, जिस पर आप पहुँचे क्योंकि कोई प्रबंधक आपका इंतज़ार कर रहा था, या क्योंकि व्याख्यान कक्ष में आपका नाम पुकारा जाना था। फिर आपके बाकी समय: बंद किताब, दरवाज़े पर जूता, और माँ को फ़ोन करने का आपका वादा। इनमें से हर समय चूकने के साथ, इस भरोसे का कुछ हिस्सा जाता रहा कि आपकी बात काम में बदलेगी।

अगर आप रोज़ पंद्रह मिनट निभा नहीं सकते, तो किसी को कैसे यक़ीन दिलाएँगे कि बाकी आठ घंटों की ज़िम्मेदारी उठा सकते हैं? यह प्रबंधक का तर्क है। जब तक यह बाहर से आता है, हम इसे पूरी तरह समझते हैं।

पहले अध्याय में आपने एक ही सुबह पाँच बार अलार्म सुना था। उनके बीच एक हाथ उस फ़ैसले को टाल रहा था जो रात को लिया गया था। अब तस्वीर बड़ी हो जाती है: दिन भर में बँटी पाँच पुकारें। हर पुकार कहती है कि हाथ का काम छोड़ें और उठें। ये पाँचों नमाज़ों की पुकारें हैं।

आप वही व्यक्ति हैं

नमाज़ पढ़ने का वादा करते समय आप वही व्यक्ति हैं जो चलने, पढ़ने या माँ को फ़ोन करने का वादा करता है। इसीलिए यहाँ नमाज़ को उसी तरह पढ़ते हैं जैसे उससे पहले हर वादे को पढ़ा। इस पूरी किताब की बात का यह सबसे स्पष्ट उदाहरण है: एक तय समय, जिसकी शर्तें तैयार मिली हैं। उसका निश्चित वक़्त है, जो आपको चुनना नहीं पड़ता। एक पुकार उसकी शुरुआत बताती है। एक जगह है जहाँ आप खड़े होते हैं, मस्जिद में या किसी भी पाक जगह पर। आपके दिन में पाँचों नमाज़ों का कुल समय पंद्रह से बीस मिनट है। उतना ही जितने समय से यह किताब शुरू हुई थी।

फिर भी यह तय समय शायद हमारा सबसे बड़ा टूटा हुआ वादा हो। हम उसका वक़्त और जगह जानते हैं। उसकी पुकार सुनते हैं। फिर भी वही प्रक्रियाएँ हमें उससे चूकने देती हैं जिन्हें किताब के अध्यायों में देखा। पुकार उठती है तो हम कहते हैं, “थोड़ी देर बाद।” जैसे करीम का अंगूठा दौड़ने का अलार्म बंद कर देता था। वकील कोई उचित कारण ढूँढ़ लेता है: हाथ का काम इंतज़ार नहीं कर सकता। व्यस्त दिन एक छूट बन जाता है, जिसके बारे में कहते हैं, “बस इस एक बार।” और अगर एक नमाज़ छूट जाए, तो वह आवाज़ सुनते हैं जो कहती है, “जब बिगाड़ ही दिया है, तो क्या फ़र्क पड़ता है।” फिर अगली भी छूट जाती है।

पहले अध्याय में बंडूरा के साथ हमने देखा कि सफलता और विफलता के अनुभव अपनी काम करने की क्षमता के एहसास के स्रोतों में से हैं1। इसका मतलब यह नहीं कि एक तय समय चूकना आपके पूरे जीवन पर फ़ैसला है। लेकिन यह आपको एक ज़्यादा सटीक सवाल की तरफ़ बुलाता है: जब आप वादा करते हैं, तब आप कौन होते हैं? और आज वादा निभाने के लेखे में कौन-सा छोटा काम जोड़ सकते हैं?

हम यह भी नहीं कह रहे कि सिर्फ़ नमाज़ की पाबंदी आहार की योजना या पढ़ाई में पाबंदी के लिए पर्याप्त है। आत्मनियंत्रण के प्रशिक्षण का असर दूसरे क्षेत्रों तक पहुँचने के प्रमाण एक जैसे नहीं हैं2। हर वादे का अपना काम और तैयारी होती है, चाहे किसी पिछले वादे से आपने शुरुआत करना सीख लिया हो।

अभ्यास वही है जिसे इस किताब के हर वादे के साथ आज़माया है। तैयार शर्तें आपके बदले आपके पैर नहीं चलातीं। व्यवस्था आपके पहुँचने की करनी है: आप कहाँ होंगे, क्या छोड़ेंगे, और पिछले काम को समय निगलने से कैसे रोकेंगे।

हो सकता है आप काम का तय समय निभाएँ, फिर इस समय को दिन के बचे हिस्से के भरोसे छोड़ दें। इस फ़र्क को उसी तरह देखिए जैसे चौथे अध्याय में हफ़्ते का लेखा देखा था। उसे नाम दीजिए। फिर अगली पुकार पर अपने काम को बदलिए, बिना फ़ौरन कोई बहाना बनाए या खुद पर फ़ैसला दिए।

यह तय समय किसके लिए है?

प्रबंधक का तय समय इसलिए है कि उसे आपके काम की ज़रूरत है। लेकिन हमारी नमाज़ों का अल्लाह मोहताज नहीं है: ﴿وَمَن جَٰهَدَ فَإِنَّمَا يُجَٰهِدُ لِنَفۡسِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِيٌّ عَنِ ٱلۡعَٰلَمِينَ﴾ और जो व्यक्ति संघर्ष करता है, तो वह अपने ही लिए संघर्ष करता है। निश्चय अल्लाह सारे संसार से बड़ा बेपरवाह है। (अल-अनकबूत: 6)3। लाभ हमारा है। यह किताब उसके सिर्फ़ एक पहलू पर ठहरती है: दिन में पाँच बार अपने काम और स्क्रीन से उठना, ताकि उस दिन में अपना फ़ैसला फिर अपने हाथ में लें जो लगभग पूरा आपको अपने साथ बहाए ले जा रहा था।

आपके दिन के पाँच लंगर

दूसरे अध्याय में हमने ऐसे स्थिर लंगर ढूँढ़े थे जिनसे छोटी आदत बाँध सकें: सुबह की कॉफ़ी, काम पर पहुँचना, रात का खाना ख़त्म होना। और आपके पास पूरे समय पाँच लंगर थे जो हर दिन लौटते हैं: नमाज़ की पुकारें। साल भर सूरज के साथ अज़ान के वक़्त बदलते हैं, लेकिन पुकारें आती रहती हैं। संकेत आवाज़ है, घड़ी का अंक नहीं। अपनी जगह के अनुसार उनके वक़्त देखिए। फिर उनके आसपास की व्यवस्था कीजिए।

आप फ़ज्र के बाद पढ़ाई शुरू कर सकते हैं। ज़ुहर के आसपास काम का विराम रख सकते हैं। अस्र के बाद चल सकते हैं। मग़रिब के बाद परिवार के लिए वक़्त छोड़ सकते हैं। और इशा के बाद अपना दिन समेटना शुरू कर सकते हैं।

पाँचों लंगरों को बीस वादों से मत भरिए। जिस नमाज़ का वक़्त निभाते हैं, उसके बाद एक आदत चुनिए। तय समय से पहले उसकी किताब या जूता तैयार रखिए। नमाज़ पूरी होने पर आपको अगला क़दम पता होगा।

लीना के नए दफ़्तर में ज़ुहर की अज़ान सामने की सड़क की एक मस्जिद से आती है, उसी खिड़की से जिससे धूप उसके काग़ज़ पर पड़ती है। रमज़ान में वह मुअज़्ज़िन की पुकार पूरी होने से पहले ही उठ खड़ी होती थी। ईद के बाद अज़ान उसे किसी डिज़ाइन के बीच में सुनाई देने लगी, और वह मन में कहती: “थोड़ी देर बाद।” फिर कोई बैठक आ जाती है, फिर ग्राहक का माँगा हुआ संशोधन, और वह अस्र से कुछ मिनट पहले जल्दी-जल्दी ज़ुहर की नमाज़ पढ़ लेती है, नज़र घड़ी पर टिकी रहती है।

यह बात उसे उस दिन समझ आई जब उसने अपना हफ़्ता वैसे जाँचा जैसे हिसाब जाँचा करती थी: सुबह की बैठक में वह एक मिनट भी देर से नहीं पहुँची थी, और ज़ुहर की पुकार पर वह सिर्फ़ एक बार उठी थी। उसे ईद के बाद वाला फ़्रिज का काग़ज़ याद आया, इसलिए उसने नई सूची नहीं लिखी। उसने सिर्फ़ ज़ुहर चुना।

रविवार की सुबह उसने अपनी मेज़ की दराज़ में कॉलेज की पुरानी नोटबुक और एक पेंसिल रखी, और ज़ुहर से कुछ मिनट पहले वुज़ू किया। जब सामने की सड़क से “अल्लाहु अकबर” उठा, तो उसने फ़ाइल सहेजी और गलियारे के आख़िर में बने नमाज़ के कमरे में चली गई। उसकी सहकर्मी ने पूछा: “कहाँ?” उसने कहा: “पंद्रह मिनट, फिर लौट आती हूँ।” नमाज़ के बाद वह कंपनी की फ़ाइल पर नहीं लौटी। उसने नोटबुक खोली और वह खिड़की बनाई जिससे अज़ान आई थी।

बुधवार को एक बैठक अस्र के क़रीब तक खिंच गई, इसलिए बाहर निकलते ही उसने ज़ुहर की नमाज़ पढ़ी, जल्दी में, जैसे पिछले हफ़्तों में। उसने बुधवार को अपने हफ़्ते का फ़ैसला नहीं बनने दिया; गुरुवार को पहले “अल्लाहु अकबर” पर उसने फ़ाइल सहेज दी। और हफ़्ते के आख़िर में नोटबुक में चार खिड़कियाँ थीं, हर एक में अलग रोशनी।

हर नमाज़ जिसकी पाबंदी करते हैं, निभाया हुआ एक वादा है। वादा बार-बार निभने के साथ आपकी बात शायद आपकी अपनी नज़र में फिर थोड़ा वज़न पाए। आपने कहा था कि उठेंगे, फिर उठे। अब आपके पास एक काम है जिसे किसी दूसरे वादे के समय याद कर सकते हैं।

जो सीखा, वह आपके साथ लौटता है

जब आप वादा करते हैं, तब आप कौन होते हैं? पहले भाग में: तय समय, जगह और गवाह, एक स्थिर लंगर, एक ऐसी सीमा जिस पर सौदेबाज़ी नहीं, और किए हुए काम का लेखा। दूसरे में: आपका दोस्त “कल”, वकील, खुद को इनाम में दी गई मिठाई, और विरासत में मिली बातों में से आपका चुनाव। तीसरे में: काम और करने वाले पर फ़ैसला अलग हैं, ग़ुस्सा और बात अलग हैं, मन का विचार और फ़ैसला अलग हैं, आपके हाथ की चीज़ और उसके बाहर की चीज़ अलग हैं। चौथे में: आप अपना किरदार किसके लिए निभाते हैं, अपनी चीज़ों में से क्या नहीं देख पाते, खुद को कौन-सी छूट देते हैं, और कौन आपके बदले चुनने का अधिकार चाहता है। पाँचवें में: मौसम से दिन तक, स्क्रीन से रात के खाने तक, और चूक से अगले तय समय तक।

कल, पहला लंगर

कल की योजना जिस नमाज़ से शुरू करेंगे, उसका नाम लिखिए। फिर पाँचों नमाज़ों में उसके बाद आने वाली नमाज़ों तक आगे बढ़िए। अपनी जगह के अनुसार उसका वक़्त, जगह, और उससे पहले छोड़ा जाने वाला काम लिखिए। उसके बाद की एक छोटी आदत तैयार कीजिए: दो पन्ने या दस मिनट पैदल चलना।

  1. तय समय से पहले ज़रूरत की चीज़ अपनी जगह रखिए: किताब या जूता।
  2. पुकार पर जो तैयार किया है, उसके लिए उठिए, चाहे आपकी भावना बदली न हो।
  3. नमाज़ के बाद छोटी आदत पूरी कीजिए। जो सच में हुआ, उसे दर्ज कीजिए।
  4. अगर गिर जाएँ: जो कड़ी टूटी थी, उसे नाम दीजिए। उसमें जो बदल सकते हैं, बदलिए और अगले तय समय के लिए तैयार हो जाइए।

अगर एक वादे की तैयारी को दिन-ब-दिन परखना चाहें, तो परिशिष्ट में “दो हफ़्तों की आपकी योजना” पर लौटिए। यहाँ जो लिखा, उससे शुरू कीजिए। आपको चौदह नए वादे उठाने की ज़रूरत नहीं है।

ईद के बाद जिस शनिवार उसके पिता ने उसे बुलाया था, लीना पहुँची। पहली बार उन्होंने खुद बुलाया था, घर में कोई चीज़ ख़राब हुए बिना। मेज़ पर एक छोटा लकड़ी का डिब्बा रखा था। उसने कहा, “पेचकस कहाँ है?” उन्होंने कहा, “आज कुछ ख़राब नहीं है।” वह बैठ गई और मेज़ पर कॉलेज की पुरानी नोटबुक रखी, जिसमें हफ़्ते की चार खिड़कियाँ थीं। उन्होंने डिब्बा बंद रखा। पीतल के ताले पर अंगूठा फेरा। रसोई के दरवाज़े से उसे मसालों के डिब्बे दिखाई दिए। उनके लेबल पर पिता की तिरछी लिखावट थी। उसने वह सवाल पूछा जो अपने चुने और विरासत में मिले रास्तों की समीक्षा के बाद से साथ लिए थी, “पापा, आपने मेरे लिए अकाउंटिंग क्यों चुनी?” उन्होंने कहा, “तुम गणित में अच्छी थीं।” उसने कहा, “यह आधे सवाल का जवाब है।” वह मुस्कुराए। फिर जेब से एक छोटी चाबी निकाली।

उन्होंने डिब्बा खोला। भीतर ब्रश थे जिनके सिरे सूखकर सख़्त हो गए थे। कुछ आपस में चिपक गए थे। उसने एक उठाया, दूसरा उसके साथ उठ आया। उन्होंने कहा, “अपने आख़िरी दिन मैंने इन्हें धोया नहीं था।” दोनों ब्रश अलग करने की कोशिश की, फिर छोड़ दिए। उसने कहा, “इतने सालों में इन्हें धोने का वक़्त नहीं मिला?” उन्होंने कहा, “मेरे लिए भी कोई समय-सारणी मत शुरू कर देना।” वह हँसी। उन्होंने उसका लहजा पहचान लिया था।

उन्होंने अपनी पहली नौकरी के बारे में बताया। उस आदमी के बारे में, जिसके हाथ से अधिक स्थिर हाथ उन्होंने जीवन में कभी नहीं देखा था। वह दुकानों के नाम लिखता था। रंग मिलाना और ब्रश धोना उन्हें देता था। एक बार वह नहीं आया, तो उसके पिता ने पूरा बोर्ड खुद लिखा। वह लौटा, उसके सामने खड़ा हुआ, फिर दिन की मज़दूरी उन्हें दे दी। बोर्ड वहाँ वर्षों रहा। पिता को उस सड़क से गुज़रना अच्छा लगता था। उसके पास पहुँचने से पहले ही सिर उठाकर देखते थे।

“उसके बाद मैं अकेले बोर्ड बनाने लगा। एक बार मेरे पिता आए। मेरी आस्तीन पर रंग देखा।” वह उसके हाथ में रखे ब्रश पर रुक गए। “कहा: यह कोई पेशा नहीं है।” उसने पूछा, “फिर?” उन्होंने कहा, “मेरे लिए दूसरा काम ढूँढ़ दिया।” ब्रशों की तरफ़ इशारा किया, “उस दिन मैंने इन्हें धोया नहीं।” रसोई में केतली सीटी बजाने लगी। दोनों में से कोई उसे बंद करने नहीं उठा।

उन्होंने कहा, “तुम्हारे लिए अकाउंटिंग इसलिए चुनी कि कोई तुमसे यह न कहे।” उसने ब्रश डिब्बे के किनारे रखा। कहा, “लेकिन आपने वही बात दूसरे तरीक़े से कह दी।” उन्होंने उसे देखा। फिर अच्छी कंपनी वाली बात पर नहीं लौटे। उसने नोटबुक में वह लोगो खोला जो कॉलेज के दूसरे साल बनाया था। उसे उनकी तरफ़ घुमा दिया। शनिवार की घंटे भर की मुलाक़ात अब दस मिनट में ख़त्म हो जाने लगी थी। इस बार लीना उनके यहाँ एक घंटे से ज़्यादा रुकी। वह छोटी तश्तरी में उसके लिए चाय लाए। उसने कहा कि तश्तरी रंग मिलाने के काम आ सकती है। उन्होंने कहा, “ले जाओ। चाहे यह मेरी आख़िरी चाय की तश्तरी हो।” उसने ख़ाली गिलास ढूँढ़ा। गुनगुने पानी से भरा। उसमें एक ब्रश भिगो दिया। उनसे कोई वादा नहीं किया। पानी में ब्रश हिलाया तो पुराना रंग घुलने लगा।

घर से हॉस्टल लौटकर करीम ने “पापा के लिए, या मेरे लिए” वाला काग़ज़ लैम्प के नीचे रखा। वह पंक्ति पढ़ी जिसे महीनों पहले बिना हस्ताक्षर छोड़ दिया था। खेल बंद करने का समय “पापा के लिए” वाले खाने से “मेरे लिए” वाले खाने में ले आया। नीचे लिखा, “मैं इसे इसलिए बंद करता हूँ कि पाँच बार स्नूज़ किए बिना उठना चाहता हूँ।” बिस्तर से रूममेट ने पूछा, “पूरा हो गया?” करीम ने कहा, “शुरू हुआ है।” क़लम पकड़ी और हस्ताक्षर किए: करीम। फिर नमाज़ों की समय-सारणी खोली। कल की योजना का पहला लंगर ज़ुहर को चुना। जगह लिखी, उससे पहले क्या छोड़ेगा, और उसके बाद दो पन्ने। बटुए से “मैं धूम्रपान नहीं करता, देर रात की महफ़िलों में भी नहीं” वाला कार्ड निकाला। उसके किनारे घिस गए थे। काग़ज़ के पास रखा और क़लम बंद कर दी।

सोने से पहले करीम ने गर्मियों के बाद पहली बार बैग की सामने वाली जेब खोली। बहन ने जो चित्र उसमें छिपाया था, वह मिला: वही मेज़, और नीला लड़का बड़ा हो गया था। उसने उसे लैम्प के पास मेज़ के ऊपर टाँग दिया, जैसे एक साल पहले पहला चित्र टिकाया था। मेज़ पर कोई फ़ोन नहीं था। कल की योजना लैम्प के बगल में थी। काग़ज़ के नीचे उसके हस्ताक्षर सूख चुके थे। उसने दराज़ खोली और लिफ़ाफ़ा निकाला। उसके घिसे कोने पर उँगली फेरी, फिर किनारा फाड़ा और मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। रोशनी के नीचे फैलाया।

पुराना काग़ज़ था। किनारे पीले पड़ गए थे। मोड़ों पर नरम हो गया था। लिखावट उसके पिता की थी, लेकिन फ़्रिज की समय-सारणी वाली लिखावट से छोटी और कम स्थिर।

ऊपर लिखा था, “इस साल।” नीचे तीन पंक्तियाँ थीं: दौड़ना। हर महीने एक किताब। अंग्रेज़ी।

वही सूची जो करीम ने साल की शुरुआत में फ़ोन में लिखी थी। पंक्ति दर पंक्ति।

“दौड़ना” के बगल में चौदह छोटे निशान थे, हर सुबह का एक। उनके बाद ख़ाली चौकोर खाने थे, उतनी ही सावधानी से पन्ने के आख़िर तक बनाए हुए।

काग़ज़ के नीचे नई स्याही की एक पंक्ति थी। पिता की उसी लिखावट में जिसे वह जानता था:

“तुम्हारी उम्र में लिखा था। किसी ने पूछा नहीं।”

छह शब्द। करीम ने एक बार उन्हें गिना। फिर काग़ज़ लैम्प से टिका दिया, बहन के चित्र के बगल में, जहाँ उसे दिखाई दे।

सुबह उसने दौड़ने वाला काग़ज़ दीवार से उतारा, उसके निशानों और शून्यों के साथ। पिता के काग़ज़ के पास रखा। दोनों की एक साथ तस्वीर ली और पिता को भेजी। नीचे लिखा, “रविवार, छह बजे। मैं आपसे पूछूँगा: दौड़े?”

एक मिनट बाद जवाब आया, “शाबाश।”

फ़ोन हाथ में लिए करीम ने उस शब्द का इंतज़ार किया जो हमेशा इसके बाद आता था।

वह नहीं आया।

आपके जीवन में किसने अपना काग़ज़ लिखा और किसी ने उससे उसके बारे में नहीं पूछा? इस हफ़्ते उससे एक सवाल पूछिए, बिना किसी “लेकिन” के।

दरवाज़ा खुला है

अगर आपको खुद नमाज़ पर यक़ीन नहीं, उसके वक़्त को लेकर नहीं, तो अपना सवाल लिखिए। ऐसा व्यक्ति ढूँढ़िए जो उसे सुने और ज्ञान व ईमानदारी से जवाब दे। उस यक़ीन का दिखावा मत कीजिए जिस तक अभी पहुँचे नहीं हैं। और अगर धर्म के नाम पर बोलने वाले किसी व्यक्ति ने आपको चोट पहुँचाई है, तो आपको उससे अपनी रक्षा करने और उसकी आवाज़ से दूर नमाज़ को देखने का हक़ है, उस आवाज़ के पास लौटे बिना।

उठिए… चाहे सौवीं बार ही क्यों न हो।

﴿فَإِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًا ۝ إِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًۭا﴾ निःसंदेह हर कठिनाई के साथ एक आसानी है। निःसंदेह (उस) कठिनाई के साथ एक (और) आसानी है। (अश-शर्ह: 5–6)4.

नबी ﷺ से पूछा गया कि अल्लाह को कौन-से काम सबसे प्रिय हैं। उन्होंने कहा: “जो लगातार किए जाएँ, चाहे थोड़े हों।” और कहा: “उतने ही काम अपने ज़िम्मे लो जितने कर सकते हो।” (बुख़ारी 6465)5.

संदर्भ (5)
  1. 1Bandura, A. (1977). Self-efficacy: Toward a unifying theory of behavioral change. Psychological Review, 84(2), 191–215. DOI.
  2. 2Friese, M., Frankenbach, J., Job, V., & Loschelder, D. D. (2017). Does Self-Control Training Improve Self-Control? A Meta-Analysis. Perspectives on Psychological Science, 12(6), 1077–1099. Source.
  3. 3पवित्र क़ुरआन, अल-अनकबूत: 6। आयत का पाठ.
  4. 4पवित्र क़ुरआन, अश-शर्ह: 5–6। आयत का पाठ.
  5. 5बुख़ारी, सहीह, हदीस 6465, आयशा से रिवायत, सहीह। हदीस का पाठ.